कार्यक्षेत्र

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में उभरते विकास का राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव का आकलन करना और रक्षा मंत्री को इस बारे में अवगत करवाना तथा सलाह देना।
  • युद्ध के सभी संभावित क्षेत्रों में शस्त्रों; शस्त्र प्लेटफार्मों; सैन्य कार्रवाइयों; निगरानी; सहायता तथा संभारिकी के सभी वैज्ञानिक पहलुओं पर रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं तथा अंतर सेवा संगठनों को सलाह प्रदान करना।
  • ऐसी प्रौद्योगिकियों के प्रापण, जिनका भारत को निर्यात विदेशी सरकारों के राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी नियंत्रणों का विषय है, के संबंध में विदेशी सरकारों के साथ समझौता दस्तावेजों के बारे में सभी मामलों पर विदेश मंत्रालय की सहमति से रक्षा मंत्रालय की नोडल समन्वयकर्ता एजेंसी के रूप में कार्य करना।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित संगत क्षेत्रों में, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा डिजाइनन, विकास, परीक्षण और मूल्याकंन के कार्यक्रमों को तैयार करना और इन्हें कार्यान्वित करना।
  • विभाग की एजेंसियों, प्रयोगशालाओं, स्थापनाओं, परिसरों, सुविधाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं का निर्देशन और प्रशासित करना।
  • सैन्य वायुयानों की उड़ान योग्यता, उनके उपस्करों और भंडारों के डिजाइन प्रमाणीकरण से संबंधित सभी मामले।
  • विभाग के कार्यकलापों से सृजित प्रौद्योगिकी की संरक्षा एवं हस्तातंरण से संबंधित सभी मामले।
  • रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रापण के लिए प्रस्तावित सभी आयुद्ध प्रणालियों और संबंधित प्रौद्योगिकियों की प्रापण तथा मूल्याकंन प्रक्रियाओं में वैज्ञानिक विश्लेषण सहायता एवं भागीदारी।
  • सशस्त्र सेनाओं के लिए उपस्कर और भंडारों का निर्माण करने वाली अथवा निर्माण का प्रस्ताव देने वाली उत्पादन यूनिटों और उद्यमों द्वारा प्रौद्योगिकी के आयात के प्रौद्योगिकीय एवं बौद्धिक संपदा पहलुओं पर सलाह देना।
  • पेटेंट अधिनियम 1970 (1970 का 39) की धारा 35 के तहत दिए गए संदर्भों से संबंधित कार्रवाई करना।
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उन पहलुओं पर, जिनका राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है, अध्ययन और जनशक्ति के प्रशिक्षण के लिए व्यक्तियों, संस्थानों, विश्वविद्यालयों एवं कॉर्पोरेट निकायों को वित्तीय एवं अन्य सामग्री सहायता उपलब्ध कराना।
  • विदेश मंत्रालय के परामर्श से राष्ट्रीय सुरक्षा में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका से जुड़े मामलों में अंतरराष्ट्रीय संबंध जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
  • अन्य देशों के अनुसंधान संगठनों और अंतर-सरकारी एजेंसियों के साथ संबंधों के मामले, विशेषकर ऐसे मामले जिनका अन्य बातों के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय पहलुओं पर परस्पर संबंध है।
  • विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन भारतीय वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों को विदेशी अध्येतावृतियां और प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक और अनुसंधान उन्मुख संस्थानों या विदेश में कार्पोरेट निकायों के साथ प्रबंध करना।
  • विभाग के बजट के नामे लिखकर कार्यों का निष्पादन और भूमि की खरीद करना।
  • विभाग के नियंत्रणाधीन कार्मिकों से संबंधित सभी मामले।
  • विभाग के बजट से सभी प्रकार के भंडार, उपस्कर और सेवाओं का अधिग्रहण।
  • विभाग से संबंधित वित्तीय स्वीकृतियां।
  • भारत सरकार के किसी अन्य मंत्रालय, विभाग, एजेंसी जिसकी गतिविधियों का राष्ट्रीय सुरक्षा के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय पहलुओं पर असर पड़ता हो, के साथ समझ या व्यवस्था के जरिए विभाग को निर्दिष्ट या विभाग द्वारा स्वीकार की गई कोई अन्य गतिविधि।
  • स्वायत्त निकायः वैमानिकीय विकास एजेंसी।

साझेदार & ग्राहक

प्राथमिक रूप से, निम्नलिखित एजेंसियों को परिवर्ती स्तर में रक्षा अनुसंधान तथा विकास विभाग के साझेदारों (स्टेकहोल्डरों)/ग्राहकों के रूप में पहचाना गया हैः:

  • रक्षा मंत्रालय
  • विदेश मंत्रालय
  • गृह मंत्रालय/अन्य मंत्रालय
  • सेना
  • नौसेना
  • वायुसेना
  • अन्य सरकारी विभागों, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास केंद्र
  • शैक्षणिक संस्थान
  • आयुध फैक्ट्रियां, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एवं औद्योगिक साझेदार
  • देश के नागरिक

साझेदारों/ग्राहकों को प्रदत्त सेवाओं का विवरण

साझेदारों /ग्राहकों को दी गई सेवाओं का उपरोक्त 'गतिविधियों/व्यापार का कार्यक्षेत्र' शीर्षक में उल्लेख किया गया है। सारांश नीचे दिया गया है:

  • शस्त्रों/प्रणालियों का डिजा
  • न एवं विकास करना
  • सेनाओं द्वारा प्रारंभ की गई वैज्ञानिक परियोजनाओं में सहायता करना
  • स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देना
  • डीआरडीओ द्वारा विकसित विभिन्न मदों का प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करना
  • उत्पादों के उन्नयन पर कार्य करना
  • डीआरडीओ एवं उद्योगों के बीच इंजीनियरों के आपसी स्थानांतरण को सुविधाजनक बनाना।

साझेदारों की शिकायतों/चिंताओं का समाधान

  • विभाग का प्रमुख कार्य सशस्त्रसेनाओं के लिए अत्याधुनिक शस्त्र प्रणालियों और सेंसरों का डिजाइन, विकास और इन्हें उत्पादन तक ले जाना है। विभाग साझेदारों/ग्राहकों को विभिन्न मंचों के माध्यम से अपनी गतिविधियों में भाग लेने का अवसर प्रदान करता है और आवश्यकता के आधार पर ऐसे साझेदारों/ग्राहकों की भागीदारी सुनिश्चित करता है जो विभाग की कार्यप्रणाली को सीधे और सक्रिय रूप से प्रभावित करते हैं। पीयर समीक्षा समितियां, निगरानी समितियां, शीर्ष बोर्ड, परिचालन समितियां तथा ओपन हाउस इसके कुछ उदाहरण हैं।
  • साझेदार अपने विचारों, आशंकाओं, आपत्तियों आदि के साथ अपनी रुचि की परियोजनाओं/कार्यक्रमों की निगरानी में लगातार भाग लेते रहते हैं। जैसे-जैसे परियोजनाओं/कार्यक्रमों की प्रगति होती है, इन पर वस्तुगत दृष्टि से चर्चा की जाती है और उनका समाधान किया जाता है। परियोजना/कार्यक्रम विशेष की जरूरत के अनुसार उपयुक्त तरीके से समितियों और बोर्डों का गठन किया जाता है और उनकी बैठक अनिवार्य आवधिकता पर आयोजित की जाती हैं। इस तरह से साझेदारों/ग्राहकों की सभी आशंकाओं का वस्तुगत रूप से और समय पर संस्थागत तरीके से समाधान किया जाता है।
  • सेनाओं के साथ सामान्य पारस्परिक कार्रवाई के लिए, विभाग के मुख्यालय में सेनाओं के साथ कार्य व्यवहार के लिए पारस्परिक कार्रवाई निदेशालय है। अन्य सभी एजेंसियों के लिए विभाग का प्रथम संपर्क बिंदु योजना एवं समन्वय निदेशालय है। नागरिकों के घोणषापत्र के लिए योजना एवं समन्वय निदेशक पदेन नोडल अफसर हैं।

साझेदारों /ग्राहकों से अपेक्षाएं

रक्षा मंत्रालय

  • भावी योजनाओं के विकास में विभाग को शामिल करना
  • विभाग को खतरा की आशंका से अवगत कराना
  • सुरक्षा एवं आत्म निर्भरता सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी रक्षा प्रणालियां शामिल करने के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार करना।

सेवाएं

  • स्वदेश में विकसित किए जाने वाले तथा आयातित उत्पादों की संकल्पना तैयार करने से लेकर उनके नियोजन तक की पूरी प्रक्रिया में विभाग को शामिल करना
  • परीक्षणों एवं स्वीकार्यता परीक्षणों के ज्ञान एवं कार्यविधियों को विभाग के साथ साझा करना
  • प्रयोक्ता परीक्षणों एवं स्वीकार्यता परीक्षणों के परिणामों को सहज एवं पारदर्शी ढंग से साझा करना
  • भावी योजनाओं को विभाग के साथ साझा करना
  • विभाग से विचार-विमर्श करके एकीकृत योजनाएं तैयार करना
  • विकास परियोजनाओं/कार्यक्रमों में वित्तीय साझेदार बनना
  • परियोजनाओं/कार्यक्रम दलों के लिए उपयुक्त पृष्ठभूमि वाले अफसरों एवं कर्मचारियों को तैनात करना।

उत्पादन साझेदार

  • विभाग द्वारा विकसित की गई प्रौद्योगिकियों का एक दीर्घकालीन रणनीतिक दृष्टिकोण विकसित करना
  • रुचि की विकासात्मक परियोजनाओं में वित्तिय दावेदारी रखना
  • समवर्ती प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, समावेशन और विभाग द्वारा विकसित मदों के उत्पादन के लिए संसाधनों का आवंटन करना
  • विभाग की मदद से या उसकी मदद के बिना उत्पादों के उन्नयन पर कार्य करना
  • सुविधाओं के उन्नयन, निर्माण और परीक्षण के लिए डीआरडीओ और उद्योग के बीच इंजीनियरों के आदान-प्रदान को सुविधापूर्ण बनाना।

अन्य क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास केंद्र

  • विभाग द्वारा विकसित नवजात प्रौद्योगिकियों के लिए प्रौद्योगिकी उद्धवन केंद्र के रूप में कार्य करना
  • विभाग द्वारा स्थापित प्रौद्योगिकियों पर संवर्धक अनुसंधान एवं विकास कार्य करना।

शैक्षणिक संस्थान (एकेडमिया)

  • विभाग के हित के क्षेत्रों में प्रायोजित/संविदात्मक अनुसंधान, सहायता अनुदान परियोजनाओं पर कार्य करना
  • वैमानिकीय, नौसेना, आयुध तथा जीवन विज्ञान के क्षेत्रों में विभाग के अनुसंधान बोर्डों के माध्यम से मूल विज्ञान को समर्पित परियोजनाओं पर कार्य करना
  • रक्षा के क्षेत्र में यथा लागू उभरती हुई तथा भावी प्रौद्योगिकियों के लिए विभाग के मार्गदर्शन के तहत विशेषज्ञता केंद्र स्थापित करना

संपर्क जानकारी

  • सचिव, रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग एवं चेयरमैन डीआरडीओ,
    डीआरडीओ भवन, नई दिल्ली-110011
    दूरभाष : 011-23011519
    फैक्स : 011-23018216

  • महानिदेशक (आरएंडएम)
    डीआरडीओ भवन, नई दिल्ली - 110 011.
    दूरभाष : 011-23011860
    फैक्स : 011- 23015395

  • नागरिक चार्टर के लिए नोडल अधिकारी
    निदेशक, योजना और amp; समन्वय
    डीआरडीओ भवन, नई दिल्ली - 110 011.
    दूरभाष : 011-23016278
    फैक्स : 011-23016174.
    ई-मेल : nabikrish[at]hqr[dot]drdo[dot]in

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