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निदेशक प्रोफाइल

डॉ. मनजीत सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से भौतिकी में एम.एस.सी., एम. फिल. पूरा करने के बाद, 10 दिसम्बर, 1984 को टर्मिनल प्राक्षेपिकी अनुसंधान प्रयोगशाला (टीबीआरएल) में वैज्ञानिक 'बी' के रूप में डीआरडीओ में शामिल हुए। टीबीआरएल में शामिल होने के बाद से वे उच्च विस्फोटक और शॉक गतिशीलता के विस्फोटकों' के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, जो उनकी सक्षमता और विशेषज्ञता का मुख्य क्षेत्र रहा है। इस क्षेत्र में वे सतह पर प्रभाव के प्रयोगों और अन्तःस्फोट प्रणाली का उपयोग कर एमबीएआर (Mbar) दबाव क्षेत्र के अंतर्गत सामग्रियों के गतिशील झटका (शॉक) संपीड़न के लिए प्रौद्योगिकियों के विकास पर काम कर रहे हैं। उन्होंने विस्फोटक लहर जेनरेटरों, सेंसरों और एक माइक्रोसेकेंड के अंश में विभिन्न प्रदर्शन मापदंडों को सफलतापूर्वक मापने की प्रयोगात्मक तकनीक के डिजाइन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अत्यंत तेजी से निदान और मॉडलिंग एवं अनुकार तकनीकों के मिश्रण के साथ उन्होंने अपने प्रभाग को प्रदर्शन मूल्यांकन और देश को रणनीतिक प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भर बनाने के लिए आवश्यक विभिन्न विस्फोटक प्रणालियों के डिजाइन अनुकूलन के लिए उत्कृष्टता का एक केंद्र बना दिया है।

शॉक और विस्फोटक प्रभाग के प्रमुख होने के अतिरिक्त वे गन ग्रुप और स्पार्क एवं बैफल रेंज के समूह निदेशक रहे हैं, जो शरीर और वाहन कवच, उच्च तनाव दरों पर सामग्री के लक्षणों के वर्णन और सामग्री के अति वेग प्रभाव के लिए प्रतिक्रिया के प्राक्षेपिकी मूल्यांकन में शामिल हैं। उन्होंने पाउडर गनों, टू स्टेज लाइट गैस गन (दो चरण हल्की गैस बंदूक) और स्पिल्ट हॉपकिन्सन प्रेशर बार (भाजित हॉपकिन्सन दबाव पट्टी) (एसएचपीबी) युक्त अत्याधुनिक प्रयोगात्मक सुविधाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने टीबीआरएल को एक अनूठा केन्द्र बना दिया, जहां एक ही स्थान पर प्रक्षेप्य को 300 से 8500 मीटर/रों के वेग से छोड़ा जा सकता है। उनका विभाग डीआरडीओ, सीएसआईआर, डीएई, सशस्त्र सेनाओं, अर्द्धसैनिक बलों, शैक्षिक संस्थानों और निजी उद्योगों की सहयोगी प्रयोगशालाओं के सभी परीक्षणों और मूल्यांकन आवश्यकताओं का समर्थन कर रहा है।

उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और सम्मेलन की कार्यवाही में 30 से अधिक पत्र प्रकाशित किये हैं और वर्ष 2001 में अपनी पीएच.डी. पूरी की। अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों और सम्मेलनों में अपने शोध कार्य को पेश करने के लिए उन्हें इजराइल, अमरीका, दक्षिण अफ्रीका, स्विट्जरलैंड और जर्मनी में प्रतिनियुक्त किया गया था। राष्ट्रीय महत्व की परियोजना में भागीदारी और योगदान के लिए वर्ष 1998 में उन्हें प्रधानमंत्री द्वारा नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया था। विस्फोटक और झटका (शॉक) गतिशीलता में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 2001 में उन्हें रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार द्वारा प्रौद्योगिकी पुरस्कार दिया गया था।

विभिन्न प्रक्रियाओं को विकसित और मानकीकृत करने के उद्देश्य से वर्ष 2003 में उन्हें संस्थान की समस्त गतिविधियों को व्यवस्थित और कारगर बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने इस दिशा में पहल की और संस्थान में अंतर्राष्ट्रीय मानक आईएसओ 9001:2000 के अनुसार गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (क्यूएमएस) लागू करने का फैसला किया। उन्होंने संस्थान की तकनीकी और समर्थन प्रक्रियाओं की पहचान की और गुणवत्ता पुस्तिका, प्रक्रियाओं, कार्य निर्देशों, प्रारूपों को बनाया और प्रलेखित किया तथा प्रभागीय गुणवत्ता उद्देश्यों और प्रक्रिया प्रदर्शन संकेतकों को भी विकसित किया। उन्होंने कर्मचारियों के लिए जागरूकता कार्यक्रमों और आंतरिक लेखा परीक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों की व्यवस्था की। जनवरी 2005 में टीबीआरएल को आईएसओ 9001:2000 प्रमाणित प्रयोगशाला घोषित किया गया। तीन निगरानी लेखा परीक्षणों और पुनःप्रमाणन लेखापरीक्षा के बाद जनवरी 2011 में टीबीआरएल को पुनः प्रमाणित किया गया है। गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (क्यूएमएस) के कार्यान्वयन द्वारा सुव्यवस्थित गतिविधियों और दस्तावेजों और अभिलेखों का पता लगाने की क्षमता के बेहतर नियंत्रण के माध्यम से प्रयोगशाला के कार्यकरण में सुधार लाया गया है।

उन्होंने वित्त, परियोजना और संसाधन प्रबंधन इत्यादि को भी सुव्यवस्थित किया है। उन्होंने लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) और संस्थान के प्रबंधन प्रतिनिधि (एमआर) के रूप में भी कार्य किया है।

वह डीआरडीओ के उत्तरी क्षेत्र (जोन) खेल परिषद के अध्यक्ष है। वे भारतीय भौतिकी एसोसिएशन, भारत की वैमानिकी सोसाइटी के सदस्य और भारत की उच्च ऊर्जा सामग्री सोसाइटी (एचईएमएसआई), चंडीगढ़ दिल्ली खंड के सचिव भी है।

29 जुलाई 2011 को उन्होंने टीबीआरएल के निदेशक का पद ग्रहण किया।

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