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प्रयोगशाला के बारे में



  • हिमाच्छादित सीमा सड़कें अधिकतम अवधि के लिए खुली रखने के महत्व को महसूस करते हुए, ब्रिगे. एनबी ग्रान्ट, एवीएसएम, ने 1965 में भारत में हिम और संबंधित पहलुओं पर एक कार्यक्रम आरंभ किया। कोर ऑफ इंजीनियर्स तथा आर एवं डीई (इंजी.), पुणे के आरंभिक प्रयासों से 1969 में डीआरडीओ के तत्वावधान में हिम और भूस्खलन अध्ययन प्रतिष्ठान (एसएएसई) अस्तित्व में आया।


  • एसएएसई ने 1971 से 1977 तक सुस्थिर विकास दर्ज किया तथा सलाहकार समिति के गठन के साथ एसएएसई की भूमिका का विस्तार हुआ। हिमस्खलन पूर्वानुमान, कृत्रिम प्रवर्तन, संरचनात्मक नियंत्रा और जागरूकता पैदा करना सेस (एसएएसई) की गतिविधियों का अंग बन गए। अति उच्चता प्रेक्षणशालाओं का एक विशाल नेटवर्क भी स्थापित किया जा चुका था।


  • ग्रेट हिमालय में सेस (एसएएसई) प्रेक्षण अवस्थिति (पाटसेओ)                पाटसेओं स्थित हिम-मौ प्रेक्षणशाला

  • जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन प्राक् अक्षों को योजनाबद्ध ढंग से सर्वेक्षण किया गया तथा भूस्खलन मानचित्र तैयार किए गए। सन् 1990 में शीत प्रयोगशाला स्थापित की गई तथा हिम भौतिकी और यांत्रिकी पर अनुसंधान आरंभ किया गया। नब्बे के दशक में हिमालय क्षेत्र में मौसम प्रेक्षण केन्द्र के नेटवर्क के सघनीकरण हेतु स्वचलित मौसम केन्द्रों (एडब्ल्यूएस) का संस्थापन आरंभ किया गया।


  • एसएएसई समय की कसौटी पर खरा उतरा और यथासमय हिमाच्छादित पर्वतीय क्षेत्रों में अमूल्य जीवनों की रक्षा के लिए शीत क्षेत्र विज्ञान एवं इंजीनियरिंग में एक अग्रणी अनुसंधान केन्द्र बन कर उभरा है। एसएएसई ने गत 40 वर्ष के अपने विकास के क्रम में प्रभावशाली वैज्ञानिक और तकनीकी अवसंरचना सृजित की है, जिसमें भूस्खलन के संरचनात्मक नियंत्रण हेतु परीक्षणात्मक अनुसंधान केन्द्र, भूस्खलन गतिकी प्रतिरूपण हेतु हिम प्रवणिका, निम्न ताप कंक्रीट परीक्षण सुविधा, एक्स-रे माइक्रोटोमाग्राफी सुविधा, रेडियो आधारित सुदूर दूरमिति प्रणालियां, सुदूर संवेदन प्रयोगशाला तथा मोडिस भू ग्राही केन्द्र कुछ प्रमुख नाम हैं।


  • बनिहाल टॉप में अवधाव नियंत्रण संरचनाएं सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा हिमखंड का 3-डी शैलप्रदेश प्रतिरूपण


  • पश्चिमी हिमालय का एक विशाल क्षेत्र, जिसमें ग्यारह प्रमुख सड़क अक्ष और अनेक मार्ग सैनिकों और सिविल आबादी को सन्निकट भूस्खलन खतरे की पूर्वचेतावनी हेतु ढके जा रहे हैं। विभिन्न स्थानों पर भूस्खलन पूर्वानुमान केन्द्र (एएफसी) तथा पर्वतीय मौसम केन्द्र (एमएमसी) स्थापित किए गए हैं। हिमालय में पर्वतीय मौसम विज्ञान के विकास के लिए थलसेना, भारतीय मौसमविज्ञान विभाग (आईएमडी), राष्ट्रीय मध्यम परास मौसम पूर्वानुमान केन्द (एनसीएमआरडब्ल्यूएफ) भारतीय वायुसेना तथा एमएचए के सहयोग से एक अंतर मंत्रालयी परियोजना आरंभ की गई है।


  • एसएएसई अंटार्कटिक पृष्ठ ऊर्जा संतुलन और ग्लेशियर्स के मानीटरन के क्षेत्रों में जारी अनुसंधान गतिविधियों द्वारा भारतीय अंटार्कटिक कार्यक्रम में भी सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। सेस (एसएएसई) अपनी विकास यात्रा के दौरान अनेक परिसंवाद, सेमिनार तथा कार्यशालाएं आयोजित कर चुका है, जहां प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों तथा उपयोगकर्ताओं को एक साझा मंच पर लाने तथा हिमालयी क्षेत्र में विभिन्न प्राकृतिक खतरों को कम करने के तरीकों तथा साधनों पर विचार करने हेतु प्रयास किए गए हैं।


  • पर्वतीय मौसमविज्ञान केन्द्र, जम्मू
    एसएएसई अंटार्कटिक में एडब्ल्यूएस


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