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Historical Background

लेजर विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र (एलएएसटीईसी), दिल्ली 1952 में डीआरडीओ की एक सूक्ष्म प्रयोगशाला के रूप में रक्षा विज्ञान प्रयोगशाला (डीएसएल) के रूप में स्थापित हुई। प्रारंभ में डीएसएल को राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल) इमारत से संचालित करते थे। बाद में 1960 में, यह मेटकाफ हाउस में स्थानांतरित की गई। 1982 में, डीएसएल मेटकाफ भवन परिसर में अपनी नई तकनीकी की इमारत में ले जाया गया और रक्षा विज्ञान केन्द्र (डीएससीसी) के रूप में पुन:नामकरण किया गया। 1999 में, अनुसंधान एवं विकास के ज़ोर को लेज़र और ऑप्टो इलेक्ट्रॉनिक्स प्रणालियों और संबंधित प्रौद्योगिकियों के विकास की ओर देखते हुए, प्रयोगशाला का लेजर विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र (एलएएसटीईसी) के रूप में नामकरण किया गया। समय के साथ, डीएसएल के कई उत्पादों को नवगठित, विशिष्ट डीआरडीओ प्रयोगशालाओं को दिए गए है। डीएसएल ने एक अग्रदूत के रूप 15 प्रतिशत डीआरडीओ प्रयोगशालाओं को सेवाएं दी है जिनमे डीआरडीएल, एसएसपीएल, इनमास, एफआरएल, आईएसएसए, डेसीडॉक, सिफीस, एसएजी और आईटीएम शामिल हैं।

1982 में, डीएससीसी को लेज़रों पर अपना प्रमुख जोर देने ले लिए कर्तव्यों का एक नया चार्टर दिया गया था। 1986 में, केंद्र को अपने प्रमुख मिशनों में से एक के रूप में निर्देशित ऊर्जा अनुप्रयोगों के लिए लेज़रों के विकास के लिए जिम्मेदार बनाया गया था। इसके बाद से एलएएसटीईसी उच्च शक्ति लेजर स्रोतों और संबंधित तकनीकों, इलेक्ट्रो-ऑप्टिक प्रत्युपाय के उपकरण और युद्ध के मैदान की ऑप्टो इलेक्ट्रॉनिक्स प्रणालियों के विकास के लिए उत्कृष्टता के एक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ है। 

 

 
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