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प्रयोगशाला के बारे में

रक्षा सामग्री और भंडार अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (डीएमएसआरडीई) वर्ष 1929 में हार्नेस एंड सैडलेरी फैक्टरी, कानपुर में सामान्य भंडार निरीक्षणालय के रूप में हुई थी। तब से, समय के मांग के अनुरूप इसका टीडीईएस, डीआरएल (एस), और डीआरएल (एम) के रूप में सामान्य रूपांतरण होता रहा है और यह 1958 में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के गठन पर इसका एक हिस्सा बन गया है। रक्षा सामग्री एवं भंडार अनुसंधान और विकास की इसके वर्तमान स्वरूप में स्थापना तीन स्थापनाओं अर्थात, भूतपूर्व रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला (सामग्री). वस्त्र एवं भंडार अनुसंधान एवं विकास स्थापना और रक्षा भंडार परिरक्षण और पैकेजिंग संस्थान का विलय करके 1976 में की गई थी। यह महसूस किया गया कि तीनों ईकाइयों के बीच तालमेल गैर-धात्विक सामग्रियों के क्षेत्र में रक्षा सेवाओं की सभी वर्तमान और भविष्यगत आवश्यकताओं को एक समेकित तरीके से पूरा करके और श्रमशक्ति और अवसंरचना का बेहतर तरीके से उपयोग करके परिवर्धित क्षमताओं को उत्पन्न करेगा। रक्षा सामग्री और भंडार अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान ने सेवाओं की वर्तमान और भविष्यगत सामग्री संबंधी आवश्यकता और डीआरडीओ के प्रमुख कार्यक्रमों के मद्देनज़र गैर-धात्विक सामग्रियों में अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के नियोजन और संचालन के लिए विनिर्दिष्ट डीआरडीओ की एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला के रूप में लगातार प्रगति की है। डीएमएसआरडीई ने लगातार इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए व्यापक रूप से योगदान दिया है। यह स्थापना अर्हताप्राप्त और सक्षम श्रमशक्ति और अध्ययनों को करने के परिष्कृत आधुनिक साधनों से, जो विभिन्न गैर-धात्विक सामग्रियों में वृहत, सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म (नैनो) स्केल स्तरों पर होने वाले सतत और क्वांटम प्रभावों के संबंध में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में विकसित हुआ है। विश्वपटल पर नई और उन्नत सामग्रियों और प्रौद्योगिकियों के उभरने के साथ वैश्विक विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। डीआरडीओ ने रक्षा सेवाओं के लिए और अधिक तर्कसंगत, उन्नत और समय पर परिणामों को प्रदान करने की दिशा में अपनी गतिविधियों और संसाधनों को पुनः केन्द्रित भी किया है।
इस प्रक्रिया में,  रक्षा बलों और राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक हितों में समयबद्ध गतिविधियों को अलग हटाकर और ऐसी ही अग्रणी गतिविधियों को तर्कसंगत बनाकर और समेकित करके प्रयोगशालाओं के दायित्वों के चार्टर को पुनः परिभाषित किया गया है।

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