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निदेशक प्रोफाइल

डॉ विकास कुमार, वैज्ञानिक-एच ने 1 अगस्त, 2017 को रक्षा धातुकर्म अनुसंधान प्रयोगशाला (डीएमआरएल), हैदराबाद के निदेशक के रूप में पदभार ग्रहण किया। वे 1982 में डीएमआरएल में हुए, उन्होंने धातुकर्म इंजीनियरिंग में आईआईटी, रूड़की (पहले रुड़की विश्वविद्यालय) से 1980 में अपनी बैचलर की डिग्री की, 1982 में आईआईटी, कानपुर से एम.टेक और 1995 में आईआईटी, मद्रास से पीएचडी की। वह सेंटर डेस मटेरियाक्स, इएनएनएसएमपी, पेरिस, फ्रांस में दो साल के लिए विजिटिंग वैज्ञानिक रहे हैं और उन्होंने एयरोइंजनों के लिए उन्नत सामग्री के विकास पर इंडो-फ़्रेंच सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रम की रूपरेखा के तहत काम किया है। उन्होंने तीन दशकों से अधिक समय से डीएमआरएल में थकान और फ्रैक्चर यांत्रिकी के क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित की है, परीक्षण और विश्लेषण के लिए कई अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर कोड विकसित किए हैं। वर्तमान में, वह थर्मो-मैकेनिकल थकान, क्षतिग्रस्त यांत्रिकी, जीवन पूर्वाभास और सैन्य एयरोइंजन एवं हथियार प्रणालियों के संरचनागत अखंडता विश्लेषण में शामिल हैं। उन्होंने डीएमआरएल में एयरोस्पेस, कवच और नौसेना अनुप्रयोगों के लिए सामग्री के विकास से संबंधित कई परियोजनाओं में योगदान दिया है। इनमें स्वदेशी तौर पर विकसित उच्च शक्ति और उच्च कठोरता स्टील डीएमआर-1700 को रॉकेट मोटर आवरण के लिए मैराजिंग स्टील के रूप में प्रतिस्थापन, नौसेना अनुप्रयोगों के लिए एबी ग्रेड स्टील, बॉडी और टैंक एप्लीकेशन के लिए जैकाल और स्पेड कवच तथा गैस टरबाइन अनुप्रयोगों के लिए टाइटेनियम मिश्रधातु शामिल है। वह भारतीय सेना के लिए विभिन्न मूल के गन बैरल जैसी हथियार प्रणालियों की संरचनात्मक अखंडता और लाइफिंग विश्लेषण में भी शामिल हैं। वह भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी तौर पर विकसित एबी ग्रेड स्टील्स के विकास और प्रमाणन में भी शामिल हुए हैं।
      वे भारत के भीतर आईआईटी और विदेशों के साथ विभिन्न सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रमों जैसे अमेरिकी वायु सेना (एएफआरएल), इंडो-रूसी और इंडो-कैनेडियन परियोजनाओं की स्थापना के लिए जिम्मेदार रहे हैं। उन्होंने भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के लिए "एयरोइंजन घटकों की जीवन पूर्वाभास प्रौद्योगिकी के विकास" पर एक बहु-विषयक परियोजना की शुरुआत की है। इस परियोजना को डीआरडीओ के भीतर दुनिया भर में विकसित की जा रही अत्याधुनिक क्षतिपूर्ण सहनशीलता और क्षतिग्रस्त यांत्रिकी दर्शनों के आधार पर एयरोइंजनों के डिजाइन और लाइफिंग तकनीक में विशेषज्ञता लाने के लिए परिकल्पित किया गया है। उन्होंने इंजन की कृत्रिम परिस्थितियों के अंतर्गत सामग्री के लक्षण वर्णन के लिए उन्नत थकान टेस्ट सुविधाएं और क्षति पूर्वाभास हेतु उन्नत एनडीई सुविधाएं स्थापित की हैं। भारतीय वायुसेना की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को महसूस करते हुए, उन्होंने आईएएफ के स्वामित्व वाले कई सैन्य एयरोइंजन के जीवन विस्तार अध्ययनों का एक बहुविषयक कार्य किया है। उनमें से, भारतीय वायु सेना के लिए डीआरडीओ द्वारा रूसी एएन-32 एयरक्राफ्ट के एआई-20डी एयरोइंजनों के लिए जीवन विस्तार कार्यक्रमों का हालिया सफल क्रियान्वयन देश के भीतर किया गया प्रथम प्रमुख संयुक्त स्वदेशी प्रयास है।
      उनके मूलभूत और प्रयुक्त अनुसंधान कार्य ने कई भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पेटेंटों को प्रेरित किया है और उन्हें सेल गोल्ड मेडल, राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास निगम - एनआरडीसी पुरस्कार, मेधावी आविष्कार के लिए युनाइटेड नेशन का डब्यूआईपीओ गोल्ड मेडल, डीआरडीओ का प्रौद्योगिकी ग्रुप पुरस्कार और स्वयं आत्मनिर्भता में उत्कृष्टता हेतु अग्नि पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं की शिष्टजनों द्वारा समीक्षा तथा सम्मेलन की कार्यवाही में 100 से अधिक पत्र प्रकाशित हुए हैं। भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी (आईएनएई) ने भी उन्हें भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू के लिए प्रतिष्ठित विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में चुना है। वह 'सामग्री के यांत्रिक परीक्षण' पर भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की समिति के चेयरमैन भी हैं। वह कई व्यावसायिक निकायों जैसे द इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेटल्स (आईआईएम), एयरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एईएसआई), इंडियन सोसाइटी फॉर नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग (आईएसटीटी) के जीवनपर्यंत सदस्य हैं।

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