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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि


भारतीय सशस्त्र सेनाओं की इलैक्ट्रॉनिक प्रणाली की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, रक्षा मंत्रालय की रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला (डीएलआरएल) को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के तत्वाधान में, 1961 में स्थापित किया गया था। भारतीय सेना, वायुसेना और नौ सेना के लिए इलैक्ट्रॉनिक युद्ध सिस्टम में रडार और संचार आवृति बैंड को कवर करने के लिए डीएलआरएल की शुरुआती डिजाइन और विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अनेक उत्पादन एजेंसियों, अन्य डीआरडीओ/राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक संमस्याओं के साथ समन्वय करते हुए, डीएलआरएल ने, थलसेना, जल सेना, वायु सेना की अत्याधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए, बदलते गतिशील परिचालन पारदृश्य में, अनेक तूफानी इलेक्ट्रांनिक वायफेयर (ईडब्ल्यू) प्रणालियों को विकसित किया है। डीएलआरएल द्वारा विकसित इलैक्ट्रॉनिक युद्ध साहसिक कारनामों के पश्चात् सेवाओं में शामिल किया गया है।
ईडब्ल्यू प्रणालियों को परिक्षण और मूल्यांकन के लिए, बहुत बड़ी बुनियादी सुविधाओं, परीक्षण और मूल्याकंन की सुविधाओं की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए, ईएलएसईसी को, रक्षा इलैक्ट्रॉनिक अनुसंधान प्रयोगशाला हैदराबाद के विस्तार के रुप में 1998 में स्थापित किया गया था। चल रहे भविष्य के कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण एकिकृत आवश्यकताओं और मूल्यांकन की पूर्ति के लिए, यह अत्याधुनिक सुविधाओं से गठित हुआ है। यह 180 एकड़ जम़ीन में फैला हुआ है और जटिल इलैक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों के संयुक्त परीक्षण के लिए इसका उपयोग किया जा रहा है। जटिल प्रणाली के अनुसरण के लिए, आधुनिक ईडब्ल्यू प्रणाली तथा मॉडलिंग सुविधाएं ईएलएससी के अंदर स्थित हैं।

प्रयोगशाला का नागरिक घोषणा पत्र

  • अनुसंधान, डिजाइन, विकास, परीक्षण के वैज्ञानिक कार्यक्रमों का निर्माण, निर्देशन, निष्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित क्षेत्रों तथा इलैकट्रॉनिक युद्ध प्रणाली का मूल्यांकन  
  • संस्थान का प्रबंधन, सुविधाएं, कार्यक्रम और प्रयोगशाला की परियोजनाएं।
  • संस्थान की गतिविधि के क्षेत्रों में उत्पादन इकाई द्वारा तकनीकी लाने के लिए, प्रौद्योगिकी और बौद्विक सम्पदा के पहलुओं पर सलाह प्राप्त करना।
  • पेटेंट अधिनियम की धारा 35 के अतंर्गत वर्जित संदर्भों पर पेटेंट नियंत्रक 1970 (1970 का 90) के अनुसार पेटेंट नियंत्रण को सलाह देना और डीएलआरएल द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों और बौद्विक सम्पदाओं के अधिकारों की रक्षा करना।
  • विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी से संबंधित मानव शक्ति के प्रशिक्षण के लिए सहायता प्रदान करना, जिसका संस्थान की गतिविधि के क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव है।
  • इलैकट्रॉनिक युद्ध प्रौद्योगिकियों और आरडीओ के वैज्ञानिको के लिए प्रौद्योगिकी प्रबंधन और तीनों सेवाओं के अधिकारियों के लिए इलैकट्रॉनिक युद्ध के क्षेत्र में विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना।
  • किसी भी दूसरे मंत्रालय, विभाग, भारत सरकार की एजेंसी के विचार और व्यवस्था के माध्यम से प्रयोगशाला को दी गई या स्वीकार की गई गतिविधि, जिसकी गतिविधियों का वैज्ञानिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रौद्योगिक पहलुओं पर प्रभाव होता है
  • नागरिकों को उपयोग के लिए डीएलआरएल द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी को स्थगित करना।
  • संस्थान की गतिविधियों के क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उभर रहे प्रभाव पर आरएमको एसए को सलाह देना और सचेत करना।
  • निगरानी के सभी वैज्ञानिक पहलुओं, समर्थन, प्रतिरोधी उपायों, और मतभेद के तर्कों के संभावित मंच पर एमए, आरएम को सलाह देना।

 


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