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उपलब्धियां

उपलब्धियां (डीएआरएल)

विगत उपलब्धियां

              

  • आणविक जैवप्रौद्योगिकी साधनों द्वारा फसल सुधार कार्यक्रम में उपयोग के लिए मध्य हिमालय से 2958 बहु फसल वंशावलियां (पादप जैव-विविधता) प्राप्त की गईं।
  • टमाटर, शिमला मिर्च, बंद गोभी, करेला, लौकी, बेंगन इत्यादि सब्जियों में उच्च पैदावार प्रजातियां/संकर किस्में विकसित की गईं। ये प्रजातियां/संकर किस्में राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर विमाचित की गई हैं।.
  • पर्वतीय क्षेत्र में कम लागत की मशरूम उत्पादन प्रौद्योगिकी विकसित की गई तथा ल्यूरोटस मशरूम की उच्च पैदावार और सु अनुकूलित स्टारिन्स विकसित की गई तथा पूरे वर्ष खेती के लिए नयाचार विकसित किया गया। अरूणाचल की सरकार के अनुरोध पर 1982 में पूर्वोत्त्तर क्षेत्र में मशरूम कृषि प्रौद्योगिकी प्रारंभ की गई।
  • थार मरूस्थल के लवणमय पारितंत्र में खेती के लिए लवण सहनशील सब्जी जीनकिस्मों का संनिरीक्षण किया गया।
  • अत्यधिक ऊंचाई वाल शीत मरूस्थलों (पूह तथा लाहौल स्पीति- हिमाचल प्रदेश) में सब्जी की खेती प्रारंभ करने के लिए पद्धतियों का पैकेज विकसित किया गया। टिंकू तथा मालिंग नाला अवरोध के दौरान इस उपज का बहुत महत्व है। इस प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन 8 मा. डिवी. में भी किया गया।
  • 36 सेक्टर में ब्रौलर अंडो का ऊष्मायन तथा अंडजोत्पत्ति और ब्रौलर चिकन का प्रजनन प्रारंभ किया गया। 1993-1994 1994-1995 के दौरान सैनिकों को प्रति माह 3000 किलोग्राम ताजा पोषक ब्रौलर चिकन उपलब्ध कराया गया।
  • मत्स्यपालन प्रौद्योगिकी तथा छावनी मत्स्यिकी विकसित की गई।
  • अंगोरा खरगोश प्रजनन तथा ऊन उत्पादन और प्रौद्योगिकी में सुधार
    किया गया तथा मुन्सियारी (पिथौरागढ़) में अंगोरा ऊन ग्राम विकसित किया गया।
  • मध्यम और ऊंची पहाडि़यों के लिए ब्रौलर प्रजनन तथा अंडजोत्पत्ति हेतु नयाचार मानकीकृत किया गया।
  • पर्वतीय क्षेत्र में पशु प्रजनन हेतु पैकेज एवं पद्धतियां विकसित की गईं और पशु प्रजनन निष्पादन का मूल्यांकन किया गया। संकर नस्ल के पशु (होल्सटीन फ्रेसियन - साहीवाल) मध्यम पहाडि़यों के लिए उपयुक्त पाए गए।
  • पिथौरागढ़ जिला (उत्तरांचल) के कनालीछीना ब्लॉक में ग्राम “सिल” और ग्राम कहेको (नागालैंड) में कृषि-पशु प्रौद्योगिकियों के कार्यान्वयन द्वारा कृषि-पशु प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया गया।
  • केंचुआं, ईस्निया फीटिडा की विदेशी प्रजातियों के उपयोग द्वारा गाय के गोबर के साथ जैव-अपशिष्टों के पुनश्चक्रण के लिए एक बहुस्तरीय वर्मी-प्रौद्योगिकी विकसित की गई है।
  • मालपा आपदा (18-26 अगस्त 1998), चमोली में भूकम्प (1 अप्रैल से 6 अप्रैल 1999), महाचक्रवात प्रभावित क्षेत्र चैलानीगांव, बालासोर, उड़ीसा तथा उत्तराखंड आपदा (22-29 जून, 2013) में राहत पहुचाई गई।
  • एक सर्कुलर अंडजउत्पत्तिशाला स्थापित की गई तथा विदेशी कार्पों का प्रजनन निष्पादित किया गया। संयुक्त मत्स्य संवर्धन के लिए प्रौद्योगिकी विकसित की गई तथा प्रयोगशाला द्वारा मानकीकृत की गई। तीन प्रजातियां नामतः सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प तथा कॉमन कार्प सवर्धन 30:30:40 के अनुपात में उपयुक्त पाया गया है जिसका उपयोग अधिकतम उत्पादन के लिए ताल के सभी खानों में उपलब्ध भरण सामग्री के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार की मत्स्य कृषि में 3500 से 4000 किग्रा/हेक्ट/वर्ष तक उत्पादन हासिल किया गया है।
  • प्रयोगशाला द्वारा बेमौसम सब्जियों की खेती के लिए ग्रीनहाउस प्रौद्योगिकी विकसित की गई तथा सैनिकों को कारगिल, द्रास, माना और मलारी जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेंत्रों में (9000-16000 फीट) भी शीतकाल में ताजी सब्जियां मिलती रही हैं। प्रयोगशाला ने जल संवर्धन के तहत टमाटर की खेती के लिए पोषक घोल विकसित किए हैं तथा ये दोनों प्रौद्योगिकियां भारतीय अंटार्कटिक अभियान 9,10,11,15, तथा 16 के दौरान दक्षिणी ध्रुव पर प्रदर्शित की जा चुकी हैं।
  • 69 मा. ब्रि. तथा 9 (।) ब्रित्र की भिन्न यूनिटों में 27 ग्रीनहाउस स्थापित किए गए हैं।

        

मृदारहित खेती: जल संवर्धन

              

मृदारहित पोषक घोल में पादप विकास के परिणामस्वरूप जल संवर्धन का विकास हुआ है। यह प्रणाली चट्टानी, मरूस्थल तथा अन्य गैर उत्पादक क्षेत्रों के अलावा हिमाच्छादित पहाड़ी और अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है, जहां पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं है। इस आविष्कार से जल संवर्धन में सब्जी की खेती की प्रमुख बाधा दूर हो गई है तथा डीआईबीईआर द्वारा विकसित एकल घोल के उपयोग से यह प्रौद्योगिकी प्रयोक्ता अनुकूल बन गई है। अंटार्कटिक सहित विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सब्जियां सफलता के साथ उगाई गई हैं। जल संवर्धन में वर्षा जल के उपयोग ने इसे किसानों के बीच लोकप्रिय बनाने में नए आयाम जोड़े हैं।

मध्य हिमालयी क्षेत्रों की पारंपरिक सब्जियों के लिए कृषिवैज्ञानिक पद्धतियों का मानकीकरण तथा मूल्य वर्द्धन:

हिमालयी क्षेत्र की निम्नलिखित देशज सब्जियों का मानकीकरण उनकी कृषि तकनीकों तथा विदेशी सब्जियों को किसी खतरे की स्थिति में आपात एवं अकाल राशन के रूप में उपयोग हेतु मूल्य वर्द्धन के लिए किया गया है।

डीओसकोरेआ कुमौंसिस कुन्त , द. कुमौंसिस कुन्त. बुलबिल, स्यकलांतेरा पेड़ेता (मीठा करेला) , कोलोकसिया एस्कुलेन्ता, (गड़ेरी) , फगोपयरूम एस्कुलेन्तुम्(उगल), लेपिडिउम सातिउँ (चमसूर), उर्तिका डीयोयिका (बिकचु घास ), दीपलाज़िउम फ्रोंडोसूँ (लिंगुरा) , माइयरिका नगी (काफल) , और अमरान्तुस पणिकूलटुस (छुवा).

उपलब्धियां (डीआईबीईआर)

वर्तमान उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण

         

डीआरडीओ बायो-डीजल कार्यक्रम

जीवाश्म ईंधन के अंधाधुंध उपयोग तथा बढ़ती मांग के कारण तेजी से समाप्ति की आरे बढ़ने, आसमान छूती कीमतों के दृष्टिगत ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत (बायो-डीजल) राष्ट्र की मुख्य मांग है। उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर, यह आवश्यकता डीडीजी द्वारा क्यूएमजी ले. जन. एएस बहिया, पीवीएसएम, एवीएसएम की अध्यक्षता में 24 फरवरी, 2006 को आयोजित एकीकृत अनुसंधान परिषद की बैठक में प्रक्षेपित की गई थी। इस बैठक में क्यूएमजी तथा एमजीओ के साथ एक संयुक्त परियोजना का सुझाव दिया गया। इन निर्देशों के अनुपालन में, डीआरडीओ द्वारा माननीय रक्षा मंत्री को जटरोफा आधारित बायो-डीजल उत्पादन के पहलुओं के संबंध में एक अवधारणा पत्र दिया गया।

12 सितम्बर, 2006 को, तत्कालीन माननीय रक्षा मंत्री द्वारा अवधारणा पत्र को पढ़कर एक टिप्पणी लिखी गई।

““जटरोफा करकस की खेती और प्रसंस्करण हेतु एक परियोजना तथा सैन्य वाहनों पर जटरोफा बीज का परीक्षण प्राथमिकता के आधार पर प्रारंभ किया जाना चाहिए। जटरोफा तेल के प्रसंस्करण हेतु उपलब्ध प्रौद्योगिकियों का अध्ययन एवं उनको समुन्नत किया जाना चाहिए, ताकि एक उपयुक्त स्थान पर इस संस्थापन एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में किया जा सके। आवश्यक निधियां उपलब्ध कराई जानी चाहिए।” ."

....प्रणव मुखर्जी

इसके परिणामस्वरूप 5 वर्ष की पीडीसी तथा रू. 14.75 करोड़ लागत का “डीआरडीओ-सेना बायो-डीजल कार्यक्रम” नामक एक संयुक्त कार्यक्रम जून 2007 में स्वीकृत किया गया। इसके निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए डीआईबीईआर को नोडल प्रयोगशाला बनाने के साथ वीआरडीई, अहमदनगर, डीआरर्डी, ग्वालियर, डीएमएसआरडीई, कानपुर, एफआरएल लेह और डीआरएल, तेजपुर, शिक्षाविदों तथा सेनाओं को इस कार्यक्रम का भागीदार बनाया गया।

इस कार्यक्रम का मानीटरन आरआरएम की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय संचालन समिति द्वारा किया जाता है।

बायो-डीजल एवं अतिरिक्त उत्पादों हेतु एकीकृत दृष्टिकोण

              

  • उच्चतर उत्पादकता वाली जटरोफा की उच्च तेल प्राप्ति प्रजातियां ; अर्द्ध शुष्क जोन तथा पादपहाडि़यों हेतु चिन्हित की गई।.
  • बृहद बहुगुणन के लिए सूक्ष्म-जनन नयाचार ; मानकीकृत किया गया तथा टीईआरआई को हस्तांतरित किया गया।
  • पार-एस्टरीकरण संयंत्र: चल रहा है (सीएसआईआर प्रौद्योगिकी) परियोजना स्थल एमएफ सिकन्दराबाद
  • जटरोफा केक का निराविषीकरण: नई क्रियाविधि विकसित। पशु आहार में 5 प्रतिशत पर निराविषीकृत जेसीएम निरापद तथा गैर विषालु है।
  • उग्र पर्यावरण हेतु भंडारण और शेल्फ जीवन वर्द्धन हेतु नयाचार: बायोडीजल के लिए विकसित।
    (उष्ण पर्यावरण के लिए 06 माह से 18 माह तक)। प्रशीतन-रोधी अभिकर्मक उग्र शीत स्थिति (-20 डिग्री से. तक) में भंडारण जीवन वर्द्धन हेतु अत्यंत प्रभावशाली पाया गया।
  • रक्षा वाहनों में बायोडीजल के उपयोग के संबंध में तकनीकी परीक्षण पूर्ण किए गए: प्रयोक्ता परीक्षण निष्पादित किए जा रहे हैं।
    बी-20 नमूना में, पारंपरिक डीजल की तुलना में, बल-आघूर्ण में 9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। तथापि, एसएफसी में अधिकतम 4 प्रतिशत की कमी पाई गई।
    कैमको मे पावर टिल को बायोडीजल (बी 100) पर चलाया गया तथा यह देखा गया कि पावर टिलर डीजल पर 1.9 घटा/लीटर की तुलना में बायोडीजल पर 2.5 घटा/लीटर चलता है।
  • जैव-मीथेनीकरण संयंत्र तथा 60 केडब्ल्यूटीएच क्षमता का गैसीफायर ; संस्थापित एवं सिनगैस का उत्पादन किया जा रहा है। जनसेट में सिनगैस के उपयोग से डीजल की खपत में 50 प्रतिशत तक की कमी हुई है। पुष्टि परीक्षण किए जा रहे हैं।
  • पारऐस्टरीकरण प्रक्रिया का मानीटरन टीएलसी के माध्यम से किया जा रहा है। पार-एस्टरीकरण के समुन्नतन हेतु अन्ना विश्वविद्यालय के साथ सहयोग में अनुसंधान एवं विकास किया जा रहा है। जटरोफा तेल के भंजन हेतु संयुक्त उत्प्रेरक। AlMCM41/ZSM5 (Si/Al=25,meso-coating 20%) सर्वश्रेष्ठ उत्पे्ररक पाया गया है (चुनिंदा तौर पर गैसोलीन के लिए 60.7 प्रतिशत, केरोसीन के लिए 19.4 प्रतिशत तथा डीजल के लिए 19.9 प्रतिशत)।
  • जटरोफा को भिन्न कृंषि अपशिष्टों तथा घास कतरनों के साथ 4:1:2 के अनुपात में मिलाकर, जो इसका विघटन समय (6+5 दिन) कम कर देता है इसके केक के त्वरित विघटन के लिए कवक (अस्परगिलस अवामोरी, अस्परगिलस निडुलन्स, त्रिचोडेरमा विरिदे, फ़णेरोचएते च्र्यसोस्पोरिउम) तथा जीवाणु (स्यूडोमोनास स्तरीयता आंड आज़ोटोबाकतेर च्रूकॉककुम) कलमों द्वारा संवर्द्धन किया गया।
  • जटरोफा से छंटाई द्वारा शुष्क आधार पर अतिरिक्त 25 एमटी/हेक्ट/वाई बायोमास प्राप्त किया जा रहा है तथा बिजली के लिए बायोमास के उपयोग हेतु गैसीफायर का संस्थापन प्रक्रियाधीन है।

              

कैमेलिना सैटिवा: नए कार्प की शुरूआत

  • कैमेलिना, एक अल्पावधि गैर-खाद्य तेल पैदावार (40 प्रतिशत) फसल एनबीपीजीआर (आईसीएआर) के माध्यम से नयाचार के अनुसार प्रारंभ की गई।
  • प्रति इकाई क्षेत्रफल उत्पादन सामथ्र्य बढ़ाने के लिए कैमेलिना के साथ जटरोफा का अंतर-शस्यन: निष्पादित किया जा रहा है। फसल चक्र के लिए उपयुक्त है।
  • एक केन्द्रक बीज बृहद स्तर फील्ड परीक्षण के लिए 1087 किग्रा तक बहगुणित किया गया है।
     

 

ऐल्गल जैवईंधन अनुसंधान एवं विकास

  • स्सेनेडेसमूस स्प. को एक संभावनापूर्ण प्रजाति के रूप में चिन्हित किया गया है, जिसकी बायोमास पैदावार शुष्क भार के रूप में (450 किग्रा/हेक्ट/दिन) और कुल लाइपिड उत्पादकता 17.7 एमजी/लीटर/दिन है।
  • कार्बनिक घोल में 65 डिग्री से. पर 6-8 घंटे तक गर्म किए जाने द्वारा तेल निष्कर्षण नयाचार मानकीकृत
     
  • डीआरएल तेजपुर द्वारा प्रधावपथ ताल संवर्घन सुविधा विकसित की गई है तथा यूनिलेगल संवर्धनों जैसेकि DRL-MA-14, DRL-MA-16, DRL-MA-20, DRL-MA-10 तथा DRL-MA-13 का गतिकी अध्ययन किया गया है और कटाई समय यथेष्ट किया गया है (± 35 दिन)

हिमालय क्षेत्र में सैनिकों को ताजा आपूर्ति के संवर्द्धन हेतु शीत सह्य सब्जियों का विकास

              

वंशावलि समृद्धि तथा दाता पितृ की पहचान

  • भिन्न राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय केन्द्रों से भिन्न फसल जैसेकि टमाटर, शिमला मिर्च, करेला, खीरा, ब्रोकली, पत्तागोभी तथा मटर का जननद्रव्य प्राप्त किया गया। पैदावार, पैदावार संबंधी विशिष्टगुण, गुणवत्ता और रोग प्रतिरोध के संबंध में इनका फील्ड मूल्यांकन किया गया। इन दाता पितृ का उपयोग आगे जनन कार्यक्रम में किया गया।

नई वंशावलियों का विकास

  • डीएआरएल-70, डीएआरएल-71 तथा डीएआरएल-72 शिमला मिर्च में और डीएआरएल-68 तथा डीएआरएल-69 का विकास किया गया तथा अखिल भारतीय समन्वित सब्जी सुधार कार्यक्रम में आगे परीक्षण, पहचान तथा विमोचन के लिए दर्ज किया गया।

प्रजातियों/संकरों का विकास

राज्य सब्जी प्रजाति विमोचन समिति, उत्तराखंड द्वारा सब्जी संकर/प्रजातियां जैसेकि खीरा में संकर डीएआरएल-102, पत्तागोभी में डीएआरएल-801 तथा करेला में डीएआरएल-41 और लौकी में डीएआरएल-25 विमोचन के लिए संस्तुत की गईं।

  • राज्य सब्जी प्रजाति विमोचन समिति, उत्तराखंड द्वारा दिनांक 18 मई, 2011 को टमाटर संकर डीएआरएल-305 विमोचन के लिए चिन्हित की गई। यह संकर प्रजाति अच्छी मात्रा में पत्तों एवं मध्यम आकार के फल के साथ विकसित होती है। पौधों की ऊंचाई मध्यम आकार की होती है तथा यह अनेक शाखाओं से युक्त होती है। हर गुच्छे में 3-5 फल आते हैं। फल का औसत भार 45-50 ग्राम होता है। पके फल में टीएसएस की मात्रा 4.2 प्रतिशत होती है। इसकी संभावित पैदावार 350 क्विंटल/हेक्टेयर होती है। यह चूर्ण फफूंदी रोधी होती है। इसकी फसल 75-80 दिन में पककर तैयार हो जाती है।
  • राज्य सब्जी प्रजाति विमोचन समिति द्वारा दिनांक मई, 2013 में विमोचन हेतु शिमला मिर्च संकर डीएआरएल-70 की पहचान की गई।

पारजीनी सब्जी विकास

  • स्वदेशी पादप प्रजातियों से शीत सहनशील तथा पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण जीन्स की कलम तथा अभिलक्षणन LlaNAC, LlaCIPK, LlaDREB1b, LlaGPAT, LlaPR, LlaIPK, LlaRan, LlaDRT अर्थात Lepidium latifolium निकाले गए तथा इन जीन्स को टमाटर तथा माडल पादप तम्बाकू में रूपांतरित किया जा रहा है।
  • प्रत्याशी फसलों का शीत सहनशील तथा जीन रूपांतरण पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण जीन्स द्वारा रूपांतरण और उनका मूल्यांकन किया जा रहा है।
    • संरोधन मूल्यांकन किया गया (टी8 एवं टी9)।
    • अंकुरण पर तथा पौध चरण में कैनामाइसिन प्रतिरोध आधार पर, यथेष्टीकृत पारजीनी पुष्टि।
    • अग्रगत ऑसमोंटिन पारजीनी टमाटर से टी11 वंश।
  • LlaNAC : तम्बाकू पारजीनी टी2 वंश।
  • LlaDREB1b, LlaNAC & LlaCIPK- टी1 वंश।

आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिमालयी एमएपी‘ज के लिए कृषि-प्रौद्योगिकी का विकास

संरक्षित औषधीय पादपों की 50 महत्वपूर्ण आरटीई प्रजातिया

 

सामाजिक मिशन

मानागढ़ ग्राम को उनकी आजीविका के लिए गोद लिया

  • सब्जी तथा औषधीय पौधों की खेती
  • समुद्री झड़बेरी की खेती और मूल्य वर्द्धन

 

 

 

पेटेंट दाखिल किए गए

  • नमकीन चाय का हर्बल सूत्र तथा ऐसा सूत्र तैयार करने हेतु प्रक्रिया। आवेदन सं. 101/डीईएल/2005 दिनांकित 15 फरवरी, 2005
  • औषधीय पेय का हर्बल सूत्र तथा ऐसा सूत्र तैयार करने हेतु प्रक्रिया। आवेदन सं. 102/डीईएल/2005 दिनांकित 15 फरवरी, 2005
  • हर्बल चटनी का सूत्र तथा ऐसा सूत्र तैयार करने हेतु प्रक्रिया दिनांकित 6 जून, 2005
  • सूर्यातप और त्वचा की खुश्की के उपचार का हर्बल सूत्र तथा ऐसा सूत्र तैयार करने हेतु प्रक्रिया। पेटेंट आवेदन सं. 2301/डीईएल/2009 दिनांकित 17 नवम्बर, 2009
  • Cordyceps sinensis के पात्रे कवकजाल संवर्धन हेतु सूत्र तथा ऐसा सूत्र तैयार करने हेतु प्रक्रिया। पेटेंट आवेदन सं. 967/डीईएल/2009 दिनांकित 28 मई, 2009
  • प्रति-ऑक्सीकारक तथा रोधक्षमता-उद्दीपन गुणों से युक्त क्षमतावर्धक हर्बल सूत्र तैयार करने हेतु प्रक्रिया। पेटेंट आवेदन सं. 92086/डीईएल/2011 दिनांकित 3 अगस्त, 2011
  • पारजीनी पादपों की द्रुत, विश्वसनीय तथा संवेदी वास्तविक समय पीसीआर आधारित खोज के लिए ऑलिगोन्यूक्लियोटाइड प्राइमर्स तथा परीक्षित्र

 

 

पेटेंट जिन्हें मंजूरी प्राप्त हुइ

ल्यूकोडर्मा के उपचार हेतु हर्बल संघटन तैयार करने हेतु प्रक्रिया: पेटेंट प्रलेख सं. 190981

 

 

 

 

त्वचा विकारों के उपचार हेतु हर्बल सूत्र और उसको तैयार करने हेतु प्रक्रिया: पेटेंट प्रलेख सं. 191088
 

 

 

 

 

दांतदर्द और संबंधित विकारों के उपचार हेतु हर्बल सूत्र और उसको तैयार करने हेतु प्रक्रिया: पेटेंट प्रलेख सं. 240652

 

 

 

 

डीआईबीईआर बुलेटिन

  • उत्तराखंड और किन्नौर की पहाडि़यों में ब्रौलर उत्पादन
  • ऊन उत्पादन के लिए अंगोरा कृषि
  • मध्य हिमालय में सब्जी की फसलों का पोषक मान
  • जलसंवर्धन
  • हिमालय में कुक्कुट पालन की वैज्ञानिक विधि
  • दूध का वैज्ञानिक विश्लेषण
  • ताल मत्स्यिकी का एक परिचय
  • हिमालय में खुम्ब उत्पादन
  • पादप ऊतक संवर्धन तकनीक द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में टमाटर उत्पादन
  • मध्य हिमालय में सुगन्धि और औषधीय पादप
  • वर्मी कम्पोस्टिंग: पापदप पोषण प्रबंधन का मितव्ययी और पर्यावरण अनुकूल तरीका
  • ऐलोवेरा की खेती के लिए एसओपी
  • प्रौद्योगिकी प्रलेख: जटरोफा करकस-2008.
  • कैमेलिना सैटिवा पर एसओपी
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