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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

महान दूरदृष्टा और आधुनिक भारत के शिल्पकार स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रथम माननीय प्रधानमंत्री ने किन्हीं अदृष्ट युद्ध स्थितियां पैदा होने से उत्पन्न होने वाली संभार समस्याओं दृष्टिगत, अंर्तराष्ट्रीय सरहदों के निकट, हमारे देश के सामरिक महत्व के अत्यधिक ऊंचाई वाले हिस्सों में मौजूद कूटनीतिक सामरिक हालात पर, ध्यान दिया। उन्होंने जून 1960 में अपने अल्मोड़ा दौरे के समय प्रोफेसर बोसी सेन के साथ सम्पूर्ण हिमालय पट्टी की हालत के बारे में इस समस्या पर विस्तार से चर्चा की और इस क्षेत्र की उत्पादकता सुधारने के लिए कृषि-जीव हालात सुधारने के लिए काम करने का सुझाव दिया। स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रथम माननीय प्रधानमंत्री का स्वप्न कृषि अनुसंधान इकाई (एआरयू) अब डीआईबीईआर के रूप में साकार हुआ। इस प्रकार कार्य प्रारंभ हुआ तथा सेनाओं की आवश्यकता पूरी करने के लिए अनुसंधान एवं विकास गतिविधियां शुरू कर संभारतंत्र की समस्याएं संबोधित की गईं। इसके उद्भव और विकास का घटनाक्रम निम्नानुसार है:-

  • अप्रैल, 1961 में आईसीएआर की वित्तीय सहायता के तहत मूलतः लेह में प्रारंभ की गई एआरयू की सहायता के लिए अल्मोड़ा में तकनीकी सलाहकार प्रकोष्ठ के रूप में काम करना आरंभ किया।
  • आईसीएआर को विभिन्न संभारतंत्र और प्रशासनिक कठिनाइयों के चलते लेह अनुसंधान इकाई तथा अल्मोड़ा तकनीकी प्रकोष्ठ दोनों जुलाई, 1962 में डीआरडीओ स्थानांतरित कर दी गईं।
  • लेह इकाई को बेहतर अनुसंधान एवं विकास सहायता उपलब्ध कराने के लिए अल्मोड़ा तकनीकी प्रकोष्ठ में जुलाई, 1967 में फील्ड अनुसंधान एवं विकास गतिविधियां प्रारंभ कर दी गईं।
  • अल्मोड़ा तकनीकी प्रकोष्ठ को जुलाई 1970 से एआरयू के नए नाम के तहत मध्य हिमालय भाग में इसी प्रकार की गतिविधियों के संचालन हेतु स्व-लेखा की स्थिति मंजूर की गई।
  • विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों की जरूरतें पूरी करने के लिए 1972 में पिथौरागढ़ (5500’) तथा औली (9000’) में एआरयू के दो फील्ड स्टेशन खोले गए।
  • अप्रैल 1981 में कुमायूं पहाड़ियों के आखिरी रेलवे स्टेशन हल्द्वानी में आधार स्टेशन खोला गया।
  • डीआरडीओ के रजत जयंती वर्ष सन 1984 में कृषि अनुसंधान इकाई को डीएआरएल के रूप में समुन्नत किया गया तथा अल्मोड़ा को मुख्यालय तथा पिथौरागढ़, औली तथा हल्द्वानी को उनकी इकाई बनाया गया।
  • डीजीआर, डीएचक्यू के प्रायोजकता के अधीन जवानों को कृषि-जीव प्रौद्योगिकियों के विषय में प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए 1991 में गोरखा पुनर्वास एवं प्रशिक्षण इकाई (जीआरटीयू) राईवाला, देहरादून में एक प्रशिक्षण केन्द्र, खोला गया।
  • प्रयोगशाला द्वारा कनालीछीना ग्राम पिथौरागढ़ तथा माना ग्राम में स्थायी ग्राम विकास हेतु एक युगान्तरकारी कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। 36 सेक्टरों में कृषि पशुपालन प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया गया तथा सेना को सौंप दी गईं। ग्रीनहाउस, हाइड्रोपोनिक्स, संकर वनस्पति तथा किस्में, मशरूम की खेती प्रौद्योगिकियां शीत सह्यता, फ़र तथा ऊन के लिए अंगोरा खरगोश प्रजनन और मत्स्यपालन इत्यादि हेतु हेतु जैवप्रौद्योगिकियां विकसित की गईं तथा उनकी कार्यप्रणाली का प्रदर्शन किया गया।.
  • डीएआरएल, मुख्यालय सन 1992 में अल्मोड़ा से हल्द्वानी और 1996 में हल्द्वानी से पिथौरागढ़ स्थानांतरित किया गया।.
  • डीआरडीओ के लिए जैव-ऊर्जा के वर्द्धित महत्व और इसके कार्य क्षेत्रों का देश के भिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में किए जा रहे विस्तार के दृष्टिगत डीएआरएल का मुख्यालय अप्रैल, 2008 में एक बार पुनः हल्द्वानी स्थानांतरित किया गया।

     

     

डीआरडीओ के स्वर्णजयंती वर्ष के दौरान प्रयोगशाला का नाम एक बार पुनः बदलकर रक्षा जैव-ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (डीआईबीईआर) रख दिया गया, जो नई दृष्टि, मिशन तथा शासनादेश की चुनौतियों के लिए तैयार है। जीवाश्म इंधन के संकट का सामना करने के लिए जैवर्-इंधन पार्कों का विकास किया जा रहा है जहां सेनाओं की आपात आवश्यकता की पूर्ति के लिए जैव-डीजल का उत्पादन किया जाएगा।.

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