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उपलब्धियाँ

7.62 मिमी एसएलआर 
शुरू में शस्त्र अनुसंधान एवं विकास संगठन में जो चीजें बनाईं उनमें 7.62 मिलीमीटर ईशापोर सेल्फ लोडिंग राइफल (एसएलआर) एवं गोला-बारूद था। बाद में इनका प्रयोग 0.33 ली इनफील्ड बोल्ड एक्शन राइफल की जगह किया जाने लगा। आयुध कारखानों में अभी तक 10 लाख से अधिक राइफल तैयार की जा चुकी हैं। वर्ष 1965 एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाइयों में इस राइफल ने बखूबी काम किया।

वर्ष 1962 में चीनी आक्रमण के दौरान आयुध कारखानों द्वारा हमारे अत्याधिक जरूरतमंद सैनिकों जो हमारी पर्वत सीमाओं की रक्षा में लगे थे, उनके लिए एआरडीई ने धुंआ उगलने वाले व आंखों को चौंधिया देने वाला 75/24 पैक होवित्जर तोप बनाया। कम भार की इन तोपों को छोटे-छोटे यूनिटों में खच्चरों के जरिए पहाड़ों तक ले जाया गया। हेलीकॉप्टरों में इन्हें ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ले जाया गया। 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई में यह काम में आया। देश में बनी यह पहली तोपगन थी।

105 मिमी की इंडियन फील्ड गन (आईपीजी) जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान फील्ड आर्टीलरी रेजीमेंट के पास थी, उसका मूल रूप से निर्माण एआरडीई में किया गया। बाद में जबलपुर स्थित हथियार निर्माण आयुध कारखाना बोर्ड, गुणवत्ता मापक महानिदेशालय तोप रेजीमेंट से इसमें विशेष सेवाएं ली गई। आईएफजी का निर्माण भी आयुध कारखानों में ही किया गया।

122 मिमी रॉकेट 
  द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत सेना द्वारा 'कटयूशा' राकेटों में लगाकर इन तोपों का जर्बदस्त प्रदर्शन किया गया। युद्ध के बाद इसे और अधिक परिष्कृत किया गया। फ्री फ्लाइट आर्टिलरी रॉकेट व मीडियम आर्टीलरी गन को भी इसमें शामिल किया गया। युद्ध के ट्रेंड को देखते हुए एआरडीई ने मल्टी बैरल रॉकेट लांचर सिस्टम तैयार किया। एआरडीई ने एसएस-20 122 मिमी वाले रॉकेट का सफलतापूर्वक विकास किया है, इसमें एचईफ्रैगमेंटेशन वारहेड लगे हैं। छह लांचर मिलकर 20 सेकंड में 20 किमी के दायरे में 240 रॉकेट दाग सकते हैं। इस्पात के चार टन से अधिक टुकड़ों एवं उच्च क्षमता के विस्फोटकों की सहायता से यह फुटबाल फील्ड जितने बड़े सक्ष्य क्षेत्र को तहस-नहस कर सकता है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत सेना द्वारा 'कटयूशा' राकेटों में लगाकर इन तोपों का जर्बदस्त प्रदर्शन किया गया। युद्ध के बाद इसे और अधिक परिष्कृत किया गया। फ्री फ्लाइट आर्टिलरी रॉकेट व मीडियम आर्टीलरी गन को भी इसमें शामिल किया गया। युद्ध के ट्रेंड को देखते हुए एआरडीई ने मल्टी बैरल रॉकेट लांचर सिस्टम तैयार किया। एआरडीई ने एसएस-20 122 मिमी वाले रॉकेट का सफलतापूर्वक विकास किया है, इसमें एचईफ्रैगमेंटेशन वारहेड लगे हैं। छह लांचर मिलकर 20 सेकंड में 20 किमी के दायरे में 240 रॉकेट दाग सकते हैं। इस्पात के चार टन से अधिक टुकड़ों एवं उच्च क्षमता के विस्फोटकों की सहायता से यह फुटबाल फील्ड जितने बड़े सक्ष्य क्षेत्र को तहस-नहस कर सकता है।

उच्च परिष्कृत एंटी टैंक गाइटेड मिसाइलों के आने के बाद भी जो कि मेन बैटल टैंक (एमबीटी) को नाकों चना चबा सकता है और जो अब सर्वाधिक कीफायती हथियार मान लिया गया है और जो हथियारों से लैस एमबीटी को पराजित कर सकता है, वह उच्च वेलोसिटी वाला के.ई. एम्यूनिशन है जिसे टैंको पर लगाई गई गनों से छोड़ा जाता है। आधुनिक टैंको में फिन स्टेब्लाइज्ड आर्मर पायर्सिंग व डिस्कार्डिंग सेबोट (एफएसएपीडीएस) द्वारा इसे अंजाम दिया जाता है। सैद्धांतिक तौर पर यह उच्च गतिज उर्जा वाला, अति घना, तीर के आकार के पेनेट्रेटर से इसे उच्च आवेग (वेलोसिटी) से छोड़ा जाता है और यह कई लेयरों वाले आधुनिक एमबीटी को नाकों चने चबवा सकता है। हालांकि इसका डिजाइन काफी साधारण-सा लगता है पर उत्पादन तकनीक की काफी मांग है। एआरडीई ने सफलतापूर्वक 105 एमएम फिन स्टेब्लाइज्ड आर्मर पायर्सिंग डिस्कॉर्डिंग सेवोट (एफएसपीडीएस) का निर्माण विजयंत व टी-55 एमबीटी के लिए किया है। इस उन्नत हथियार के निर्माण पर एआरडीई को गर्व है और भारत देश उन गिने चुने देशों में शामिल हो गया है जिनके पास एफएसपीडीएस का डिजाइन व उत्पाद की तकनीक है और इस प्रकार विदेशों से तकनीक का आयात न कर विदेशी मुद्रा की देश ने बचत की है।

एआरडीई ने 51 एमएम लाइट वेट इनफैंट्री प्लाटून मोर्टार विकसित किया है। यह ऐसा हथियार है जो पोर्टेबल है और यह 2 इंच वाले मोर्टार की अपेक्षा अधिक क्षेत्र में गोले बरसा सकता है। मारक क्षमता बढ़ाने के लिए वजन को बढ़ाना जरूरी नहीं होता। इसके एचई बम में विखंडन पूर्व तकनीक का इस्तेमाल होता है और सामान्य बमों की अपेक्षा अधिक घातक होता है। गोला-बारूद के जखीरे में धुंऐ के अलावा प्रकाश करने वाले एवं प्रचलित बमों का भी विकास किया गया है। आयुध कारखानों में इसके उत्पादन पर फिलहाल काम चल रहा है।

आधुनिक सैन्य कार्यवाही रात में एवं विपरीत परिस्थितियों में भी होती है। रात के युद्ध में नाइट वीजन डिवाइसेस होने के बावजूद चमकीले गोले बारूद की जरूरत होती है। युद्ध के मैदान में युद्ध स्थल को प्रकाशित करने में इसकी जरूरत होती है। यह रक्षा करने, आक्रमण करने व लड़ाई के मैदान की पहचान में सहायक होता है। पैदल सैनिकों व लाइट आर्टीलरी के लिए कई चमकीले गोला-बारूद तैयार किए जाते हैं। इन बमों के प्रदर्शन की तुलना विश्व के सर्वोत्कृष्ट बमों से की जा सकती है।

हथियारबंद सैनिकों के लिए टी-55 एमबीटी के अप-गनिंग किट के विकास में हमने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विजयंत टैंक के पीछे मूल 100 मिमी गन लगाया गया जिसने टैंक की मारक क्षमता को बढ़ा दिया। तोप व गोला-बारूद का आधुनिकीकरण होने से लॉजिस्टिक भार कम हो गया। मजबूत चेसिस एवं कंगूरे के साथ-साथ उन्नत गन व गोला-बारूद होने के कारण टी-55 की तुलना में टी-72एस एवं विजयंत टैंको से उचित रूप में की जा सकती है।

अद्रुश्य - नब्बे के दशक के दौरान एमबीटी के बढ़ते खतरे से निबटने के लिए अद्रुश्य सक्षम है। इसमें चुंबकीय के साथ-साथ भूकंप रोधक प्रभाव होने से खान युद्ध को इसने एक नया रूप दिया है। परिष्कृत होने के साथ-साथ इसकी अदम्य मारक क्षमता से खान दुश्मन की आंखों से ओझल हो जाते हैं। यह काम में लाने में भी आसान है, वर्ष 1997 से ओएफएस पर निर्माण कार्य जारी है।

ऊंचे स्थानों पर प्रोक्सीमिटी फ्यूज को आर्टीलरी प्रोजेक्टाइल के साथ प्रयोग में इसीलिए लाया जाता है ताकि यह अधिक से अधिक प्रभावकारी बन सके। एंटी एटरक्राफ्ट व एंटी मिसाइल के रूप में भी इसे काम में लाया जाता है, इससे "नजदीकी चूकें" निश्चित "मौत" में बदल जाती है जिसके परिणामस्वरूप हथियार प्रणाली के पूर्ण निष्पादन में बढ़ोतरी होती है। अपने अधीन प्रयोगशालाओं के सहयोग से एआरडीई ने प्रोक्सिमिटी फ्यूज तैयार किया है जो सार्वजनिक उपक्रमों व आयुध कारखानों में निर्माणधीन हैं। फ्यूज में परिष्कृत इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस लगे होते हैं जो प्रोडेक्टाइल छोड़ने के साथ-साथ हजारों 'जी' फोर्स का मुकाबला करने में सक्षम हैं।

शांत माहौल में सैनिकों को प्रशिक्षण इसीलिए दिया जाता है ताकि लड़ाई में वे मशीन के साथ और अधिक कारगर हो सके। इसे ध्यान में रखते हुए एआरडीई ने सेना के लिए कई प्रशिक्षण उपकरणों का विकास किया है वे निम्नलिखित हैं:

·         इनफैंट्री सैनिकों के लिए 81 मिमी मोर्टार ट्रेनिंग उपकरण

·         आर्टिलरी के लिए 120 मिमी मोर्टार ट्रेनिंग उपकरण  

·         0.50 सबकैलिबर ट्रेनिंग उपकरण 105 मिमी विजंयता टैंक गन के लिए।

इन उपकरणों के जरिए हथियार चलानेवाले दस्ते को सही मायने में हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है जिस पर लागत हथियारों के जखीरे की खरीद का एक अंग होता है। इससे बड़े पैमाने पर फायरिंग रेंज की जरूरत भी खत्म हो गई। प्रशिक्षण की इन व्यवस्थाओं के जरिए सैनिकों को किफायती दर पर प्रशिक्षण देना संभव हो पाता है।

 
एआरडीई ने जिस सर्वाधिक प्रतिष्ठित और महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू किया है वह 120 मिलीमीटर (एमएम) मुख्य युद्ध सामग्री अर्जुन एसबीटी है। यह एक उच्च तकनीक वाला कार्यक्रम है जिसमें कई तरह के काम होते हैं। एआरडीई ने अधिक वेग वाले गन व हथियार तैयार किए हैं जिसमें एफएसएपीडीएस मूल गतिज उर्जा होती है। ऐसा पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा जा सकता है कि अर्जुन की मारक क्षमता की तुलना विश्व के समकालीन मुख्य युद्धक टैंक एमबीटी से की जा सकती है। यहां गौरतबल बात यह है कि इस प्रदर्शन श्रेणी में केवल चार गन प्रणालियां विदेशों अर्थात् इंग्लैंड, संघीय गणतंत्र जर्मनी, फ्रांस और रूस में विकसित की गई हैं। यहां तक कि अमेरिका व जापान ने जर्मन टीनमेटल गन का लाइसेंस अनुभवों को देखते हुए इंडियन स्माल आर्मस सिस्टम (इन्सास) ने अब तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीन तरह के छोटे हथियार, एलएमजी व 9 एमएम कारबाइन तैयार किया है। इंडियन स्माल आर्म्स सिस्टम इन तीनों हथियारों को हटाकर एसाल्ट राइफल, एलएमजी व 9 एमएम कारबाइन सेना में शामिल कर रही है। दो पौंड जिसमें प्रत्येक में छह रॉकेट लगे हैं वे 48 सेकेंड के दौरान गोला-बारूद की बरसात करने में सक्षम हैं और 700 x 500 मीटर क्षेत्र को निष्क्रिय बना सकते हैं। एमबीआरएस (एंडी बैलिस्टिक मिसाइल) खुले क्षेत्र में, "बी" व्हीकल में सेना को तहस-नहस करने में, दुश्मन के इरादों को नेस्तोनाबूत करने में व दुश्मन सेना को उसमें मुख्यालय में ही ध्वस्त करने आदि में प्रभावकारी होगी। इसमें कई विभागों के कार्यक्रम भी शामिल है, जिसमें डीआरडीओ लैब प्राइवेट व पब्लिक सेक्टर फर्म भी शामिल है। एआरडीई सिस्टम जोड़ेने का काम करता है और यह फ्लाइट व्हीकल, वारहेड, फ्यूज व लांचर सिस्टम के लिए उत्तरदायी है। इस व्यवस्था पर काम शुरू है और सेना द्वारा माल भेजने के शीघ्र आदेश देने की संभावना है।
नौसेना के लिए हथियार व अन्य युद्ध सामग्री  

भारतीय नौसेना के लिए पहले युद्ध सामग्री का दूसरे देशों से निर्यात किया जाता था क्योंकि उस समय देश में रक्षक जहाजों व जलयानों की संख्या कम थी हालांकि धीरे-धीरे तस्वीर बदल रही है। देश एक बड़ी नौ सैन्य शक्ति के रूप में उभर रहा है। अब हमारे पास एक ऐसी नौसेना है जो अपने समुद्र तल के अलावा आसपास की तटों की रक्षा करने में सक्षम है। एआरडीई इस परिष्कृत व काफी मांग वाले क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का विस्तार कर रहा है जिसमें मुट्ठीभर देशों का वर्चस्व है। पानी में डूबे सिग्नल इजेक्टर कॉटिजेज (एसएसई) पनडुब्बियों से छोड़े जाते हैं जो नौसैनिक अभ्यासों के दौरान व संकट की घड़ी में पानी के जहाजों, हवाई जहाजों व हेलीकॉप्टरों के लिए 'सिग्नल' का कार्य करते है। एआरडीई ने नौ-सेना के लिए इसका निर्माण किया है।

चूने का खदान  
  एआरडीई ने नौसेना के लिए चूने की खदान का निर्माण कराया है। ये खदान टारगेट पोतों के आवरण से जुड़ी होती हैं, जिनमें गोताखोर छिपे होते हैं ताकि दुश्मन सेना के जलग्रहण क्षेत्र में किसी तोड़-फोड़ की कार्यवाही से बचा जा सके। एआरडीई ने आरंभिक जरूरत को पूरा कर दिया और फिलहाल कई श्रेणियों में इसका उत्पादन किया जा रहा है।  
कम दूरी का ए/एस रॉकेट
  एंटी सबमेरीन लड़ाई क्षेत्र के लिए कम दूरी का एंडी सबमेरीन रॉकेट जिस पर वारहेड लगे होते हैं को विकसित और उत्पादित किया गया है। ये रॉकेट अकेले भी दागे जा सकते हैं या फिर पानी के जहाजों से मल्टी बैरल रॉकेट लांचर से छोड़े जा सकते हैं।
सी - माइन
  खाड़ी में हुए इरान-इराक युद्ध ने सी-माइन के महत्व को उजागर किया है, तटीय इलाकों की रक्षा के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय जलग्रहण क्षेत्र में भी इसने अपना प्रभाव दर्शाया है। सी-माइन वैसे गुप्त हथियार होते हैं जो समुद्र के तल में पड़े होते हैं और दुश्मन जहाज का इंतजार करते रहते हैं। जैसे ही दुश्मन के जहाज उस क्षेत्र में घुसते है, सी-माइन द्वारा विस्फोट कर दिया जाता है जिससे दुश्मन को भारी क्षति होती है जिससे दुश्मन के जहाज डूब भी जाते हैं। एआरडीई ने अपना सी-माइन बनाना शुरू कर दिया है। इसे पनडुब्बियों के अलावा साधारण समुद्री जहाज के खिलाफ तैनात किया जा सकता है। इसमें आधुनिक तकनीक के अलावा इलैक्ट्रिक सेंसर लगे हुए हैं जिससे लक्ष्य के पहचान में आसानी होती है। इसका विकास हो चुका है।
एमआरसीएम व 76.2 एमएम पीएफ शेल  
  फॉकलैंड के साथ-साथ खाड़ी में हुए इरान-इराक युद्ध में जमीन की सतह को छूकर निकलने वाले लंबी दूरी तक मार करने वाली एंटी-शिप मिसाइल (एएसएम) का शक्ति परीक्षण देखने को मिला। फिलहाल यह सर्वाधिक खतरनाक मिसाइल के रूप में उभर कर आई है। इस खतरे से निबटने के लिए एआरडीई ने कम व मध्यम दूरी तक मार करने वाले रॉकेटों का निर्माण किया है जो आनी वाली मिसाइल की दिशा में दागे जाते हैं। अल्मीनियम का पतला वर्क जो इन रॉकेटों द्वारा छोड़े जाते हैं, वे आते मिसाइल (प्रक्षेपात्र) को अपने लक्ष्य जहाज तक पहुंचने से रोक देता है क्योंकि ये गलत रेडियो ध्वनि पैदा कर उसे भ्रमित कर देता है। एंटीशिप मिसाइलों से निबटने के लिए एआरडीई ने नौ-सेना के लिए 76.2 एमएम पीएफएचई शेल का निर्माण किया है। यह शेल प्री-फ्रैगमेंटेड होता है और इसमें प्रोक्सीमिटी फ्यूज लगा होता है। इसलिए लक्ष्य क्षेत्र में इससे ज्यादा ऊर्जा निकलती है और लक्ष्य का नाश निश्चित है।

कितना ही जटिल हो, एक आयुध डिलीवरी प्लेटफार्म के रूप में आधुनिक कॉम्बैट एयरक्राफ्ट उन्नत प्रणोदन, वायुगतिकी, वैमानिकी आदि के साथ हो सकता है, इसके मिशन की प्रभावोद्पकता अंतत: लादे हुए हथियारों अर्थात् बमों, रॉकेटों, मिसाइलों अथवा गनों पर निर्भर करती है।

लड़ाकू विमानों के डिजाइन व विकास के साथ-साथ हथियार रखने वाली जगहों का निर्माण एआरडीई के कठिन कार्यों में है। विमान के किसी साजो-सामान को उड़ान की मंजूरी देने से पहले इसे कठिन जांच व उड़ान परीक्षण से गुजरना पड़ता है। आधुनिक लड़ाकू विमानों को बनाने में अत्यधिक खर्च के साथ-साथ प्रशिक्षित पायलट के जीवन की कीमत, डिजायनरों को इन कठिन जरूरतों को पूरा करने के लिए बाध्य करता है।

रिटार्डर टेल यूनिट 
  कम दूरी से बम फेंकने से बचने में गुंजाइश कम हो जाती है साथ ही दुश्मन के रडार व मिसाइलों व एंटीगन से कोई कसर नहीं छोड़ते। पारंपरिक ग्रेविटी बमों के कारण विमान खतरे के क्षेत्र में ही रखते हैं क्योंकि बम का प्रभाव काफी होता है। रिटार्डर टेल यूनिट (आरटीयू) व फ्यूज सिस्टम जो एआरडीई द्वारा 450 किलोग्राम (1000lb) वजन के बम के लिए तैयार किया गया है। यह हमारे लड़ाकू विमानों द्वारा उच्च वेग व कम ऊंचाई तक बम छोड़ने में मदद करता है। पैराशूट की मदद से बम को गिराया जाता है और जब तक बम नीचे आता है व उसका प्रभाव पड़ता है। विमान वहां से दूर उड़ लेता है। परिष्कृत फ्यूज लगे रहने से आवश्यक सुरक्षा मिलती है। अग्रिम दस्ते के हमारे लड़ाकू विमानों में आरटीयू के साथ 450 किलोग्राम वजन का बम रहता है।
68 एमएम रॉकेट  
  एआरडीई ने हवाई लड़ाई के लिए शुरूआत में जो परियोजना सफलतापूर्वक तैयार की थी, वह थी 68 एमएम 'एरो' रॉकेट का निर्माण। कम क्षमता के ये रॉकेट कई ट्यूब वाले रॉकेट पॉडों से छोड़े जाते हैं जिसके प्वाइंटस् काफी कड़े होते हैं और वे हवा से सतह व सतह से हवा में वार करने में सक्षम होते है। तीन प्रकार के रॉकेट-एचई, प्रैक्टस व 'हीट' का काफी संख्या में एयरफोर्स व नौ-सैनिकों के लिए निर्माण किया जा रहा है।
450 किग्रा वजन की हाई स्पीड लो ड्रैग (एचएसएलडी) बम 
आईएएफ की सेवा में लगे 1000 एलबी (450 किग्रा) के बम का डिजाइन द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही बनाया गया था और इसलिए इसे वर्तमान पीढ़ी के उच्च वेग वाले लड़ाकू विमानों में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। झुकी हुई अवस्था में जब ये विमान उड़ते हैं तो अत्याधिक ड्रैग पेनल्टी डालते हैं और यह विमान के प्रदर्शन को सामान्य तौर पर व एक्शन के रेडियस को बुरी तरह प्रभावित करता है। 450 किग्रा वजन के हाई स्पीड लो ड्रैग (एचएसएलडी) बम, एआरडीए द्वारा बनाया गया था। इस बम का अब नियमित रूप से निर्माण किया जा रहा है।
प्रैक्टिस बम 
बम मिशन पर लगे पायलटों का प्रशिक्षण जो कि सक्रिय (जिंदा) बमों के जरिए आक्रमण करते हैं, का काम काफी महंगा होने के साथ-साथ इन पायलटों की सुरक्षा के ख्याल से इन्हें उस क्षेत्र से बाहर ही रखा जाता है। इन समस्याओं से उबरने के लिए, एआरडीई ने कम वजन का रिटार्डर प्रैक्टिस बम तैयार किया है जिसे लड़ाकू, मारक व प्रशिक्षण देने वाले ट्रेनर आईएएफ व इंडियन नेवल सर्विसेज के विमानों में लगाया जाता है। यह बम विभिन्न ड्रैग प्लैटों को हटाकर बमों के प्रेक्षपण पथ तैयार कर सकता है। इस बम का आवरण फाइबर प्लास्टिक का बना होता है और इसे नियमित रूप से बनाया जा रहा है।   
एस्केप एंड कार्ट्रिज 

आधुनिक एयरफोर्स की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति काम्बैट (लड़ाकू) पायलट है। किसी पायलट को कुशलता के अपेक्षित स्तर तक प्रशिक्षित करने में काफी समय, प्रयास व पूंजी की जरूरत होती है। उनकी जान अत्याधिक कीमती होती है और उन्हें सभी विपरीत परिस्थितियों में बचाना जरूरी होता है। इसीलिए सभी लड़ाकू विमान में 'क्रू एस्केप एड सिस्टम' दिए जाते है जिसमें अत्याधिक विश्वसनीयता होने की जरूरत होती है।

विमान के इंजेक्शन सीट सिस्टम में 'एस्केप एड कार्टरिज' फिट किए जाते हैं और आपातकालीन स्थिति में यह पायलट को सुरक्षित रूप से बाहर निकलने में समर्थ बनाता है। इसी तरह, पावर कार्टरिज अन्य कार्यों जैसे आग बुझाने, कैनोपी इजेक्शन, वैपन इजेक्शन, स्टोर रिलीज प्रणाली आदि के परिचालन के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। आईएएफ, नेवी के लिए 52 एस्केप ऐड व पॉवर कार्टरिज बनाए गए हैं। प्रयोगकर्त्ता एआरडीई से ही इसका उत्पादन व आपूर्ति पर इसलिए दबाव डालते हैं क्योंकि इनकी विश्वसनीयता अधिक होती है, लगाने की कीमत कम होती है और किसी समय इसकी कम मात्रा में जरूरत भी पड़ती है। इसीलिए इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए एक पायलट परियोजना तैयार की गई है। एआरडीई द्वारा निर्मित पॉवर कार्टरिज से कई पायलटों की जान बचाई जा चुकी है। सामरिक दृटिकोण से इनका महत्व इसलिए भी है क्योंकि कार्बेट एयरक्राफ्ट या तो स्कावट्रनों या फिर अकेले ही इन महत्वपूर्ण कार्टरिज के अभाव में उड़ नहीं सकते और न ही इन्हें उड़ने के लिए तैयार किया जा सकता है। इस प्रकार हमने न केवल विदेश पर अपनी निर्भरता खत्म कर दी है बल्कि काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी बचा ली है।

पीजो इलैक्ट्रिक क्रिस्टल 
एआरडीई ने लीड जिंकोर्नेट टाइनेट पीजो इलैक्ट्रिक मैटेरियल जिसे पीजेटी के नाम से जाना जाता है, के लिए परिष्कृत तकनीक विकसित की है जो उसके लिए बड़ी सफलता है। कई हीट हथियारों के फ्यूज बनाने में इसे प्रयोग में लाया जाता है। किसी कठोर लक्ष्य के खिलाफ पीजैडटी क्रिस्टल हाइ वोल्टेज उर्जा निकालते हैं जो वारहेड को चालू करते हैं। विभिन्न आयुध परियोजनाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए एआरडीई के पायलट प्लांट में पीजैडटी तैयार किया जाता है। साहिबाबाद स्थित सेल कंपनी में भी उत्पादन करने की तकनीक स्थानांतरित की गई है जो 'ओएफ' की बड़े पैमाने पर जरूरत को पूरा करेगा। फिलहाल हमारे पीजैडटी क्रिस्टलों की मांग इसीलिए बढ़ गई है क्योंकि वे सोनट सिस्टम की मांग को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण हैं जो एएसडब्ल्यू एप्लीकेशन में लगे होते हैं बल्कि 'बार्क', 'ईसरो' व अन्य एजेंसियों के लिए वे महत्वपूर्ण होते हैं। सामरिक महत्व में इस वस्तु का देश में ही निर्माण होने से विदेशी मुद्रा की काफी बचत हुई है और विदेशों पर हमारी निर्भरता हमेशा के लिए समाप्त हो गई है। पीजो सेटामिक तकनीक के विकास के महत्व को देखते हुए व एआरडीई आरएंडडी मुख्यालयों में वर्तमान तकनीक को देखते हुए डीआरडीओ को मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही सेंसर मेटेरियल एक्चुएटर व इंडयूसर बनाने में देश को आत्मनिर्भरता प्राप्त होगी। साथ ही देश इसे पूर्व व्यापारिक स्तर पर प्रदर्शन कर सकता है और उत्पादन के काम में ला सकता है जो कि सीमित स्तर पर संभव हो सकता है।  
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