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ईआर और आईपीआर

सहायता अनुदान योजना के माध्यम से देश के विविध आकादमिक संस्थानों और अनुसंधान एवं विकास केन्द्रों में विज्ञान एवं तकनीक के संभावित इस्तेमाल का अभ्यास 1 जनवरी 1958 को रक्षा विज्ञान संगठन तथा तीनों सेवाओं की तकनीकी विकास प्रतिष्ठानों में डीआरडीओ की शुरूआत के पहले से ही किया जा रहा था, इन्हें मिला कर डीआरडीओ को बनाया गया। डीआरडीओ के सृजन के बाद, पूर्ववर्ती प्रशिक्षण एवं प्रायोजित अनुसंधान निदेशालय (डीटीएसआर) के तत्वाधान में बाह्य अनुसंधान गतिविधियां संपादित की गई थी।

सशस्त्र सेना के लिए स्टेट-ऑफ-ऑर्ट रक्षा प्रणाली के विकास की आवश्यकता के साथ, एयरोनॉटिक्स, आर्मामेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, लड़ाकू वाहन, मिसाइल, इन्स्ट्रूमेंटेशन, उन्नत कम्प्यूटिंग एवं सिमुलेशन, उन्नत पदार्थ, नौसैनिक प्रणाली, जीव विज्ञान, एनबीसी और सूचना प्रणाली सहित विविध सामरिक क्षेत्रों में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास ने डीआरडीओ की ईआर गतिविधियों में बढ़ावा के लिए बाधित किया जिसके कारण एक अलग निदेशालय के सृजन की जरूरत हुई।

1958 में अपने गठन के समय से डीआरडीओ, आईपीआर आवेदन फाइल कर रहा है जिनमें भारत और अन्य देशों में पेटेंट, डिजाइन एवं कॉपीराइट आवेदन शामिल हैं।

जैसे भी हो, 90 के दशक के आरंभ में जब मीडिया में गैट के अंतर्गत वार्ता पर बहस को प्रमुखता मिलने लगी, लोग बौद्धिक संपदा के महत्व को भी समझने लगे। भारत ने अंततः ट्रिप्स (ट्रेड रिलेटेड आस्पेक्ट्स एंड इनटलैक्चुअल प्रोपर्टी राइट्स) समझौता पर हस्ताक्षर किया और विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बन गया और इस तरह तकनीकी समन्वय निदेशालय को इस संबंध में ज्यादा संवेदनशील बना दिया। सितम्बर 1996 में डीआरडीओ मुख्यालय में तकनीकी समन्वय निदेशालय के अंतर्गत समर्पित श्रमशक्ति के साथ एक अलग आईपीआर समूह का गठन कर एक नई शुरूआत की गई। तकनीकी समन्वय निदेशालय ने, तकनीकी समन्वय निदेशालय एवं आईपीआर के रूप में काम करना शुरू किया।

डीआरडीओ में ईआर एवं आईपीआर गतिविधियों के इतिहास में एक मील का पत्थर उस समय हासिल हुआ जब 1 मई 2000 को एक पृथक ईआर एवं आईपीआर निदेशालय का अधिकारिक तौर पर गठन हुआ।

 
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